भारत में गाय को “गौ माता” का दर्जा दिया जाता है। यह केवल एक धार्मिक आस्था नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, परंपरा और जीवन मूल्यों का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सदियों से गौ माता को पोषण, सेवा और त्याग का प्रतीक माना गया है।
लेकिन आज की सच्चाई इस सम्मानजनक छवि के बिल्कुल विपरीत नजर आती है।
देश के कई शहरों और गांवों में आज गौ माता सड़कों पर भटकती दिखाई देती हैं। कचरे के ढेर में भोजन तलाशना, प्लास्टिक खाना और सड़क हादसों का शिकार होना—ये तस्वीरें अब आम हो चुकी हैं।
यह स्थिति न केवल पशु-क्रूरता को दर्शाती है, बल्कि समाज की संवेदनहीनता को भी उजागर करती है।
जब तक गाय दूध देती है, तब तक उसकी सेवा की जाती है।
लेकिन जैसे ही वह बूढ़ी हो जाती है या दूध देना बंद कर देती है, उसे बेसहारा छोड़ दिया जाता है।
यह व्यवहार उस “माता” के साथ किया जा रहा है, जिसे हम पूजनीय मानते हैं।
हाल ही में सामने आई एक घटना में एक घायल और असहाय गौ माता अपने अंतिम समय में दर्द से कराह रही थी, जबकि उसके पास खड़ा उसका छोटा बछड़ा उसे उम्मीद भरी नजरों से देख रहा था।
यह दृश्य केवल एक घटना नहीं, बल्कि पूरे समाज का आईना है—जहाँ इंसानी लापरवाही और बेरुखी साफ झलकती है।
क्या यही हमारे संस्कार हैं?
हम अपने माता-पिता को कभी इस हालत में नहीं छोड़ते, फिर गौ माता के साथ ऐसा व्यवहार क्यों?
यह सवाल आज हर उस व्यक्ति के सामने खड़ा है, जो धर्म और संस्कृति की बात करता है।
इस समस्या का समाधान केवल सरकार नहीं, बल्कि समाज की जागरूकता से ही संभव है।
हम सभी को मिलकर अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी:
गौ माता को कभी भी बेसहारा न छोड़ें
उनके लिए भोजन और पानी की व्यवस्था करें
बीमार या घायल होने पर चिकित्सा सहायता दिलाएं
आसपास की गौशालाओं का सहयोग करें
सरकार से अपेक्षा
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार को इस दिशा में सख्त कदम उठाने चाहिए।
ऐसे लोगों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, जो स्वार्थ के लिए गौ माता को त्याग देते हैं।
साथ ही, हर शहर और गांव में बेहतर और पर्याप्त गौशाला व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।
गौ माता केवल आस्था का विषय नहीं हैं, बल्कि हमारी जिम्मेदारी भी हैं।
यदि हम उनके सबसे कमजोर समय में उनका सहारा नहीं बन सकते, तो हमारे संस्कार और धर्म केवल शब्द बनकर रह जाएंगे।
अब समय है कि हम अपनी संवेदनाओं को कर्म में बदलें और इन बेजुबान जीवों के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाएं।


