टनकपुर।
उत्तराखंड के दूरस्थ और ग्रामीण अंचलों में स्वास्थ्य सेवाओं की रीढ़ माने जाने वाले उपकेंद्र आज एक गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। इन्हीं उपकेंद्रों पर वर्षों से सेवा दे रहे फार्मेसी अधिकारियों के 391 पदों के भविष्य को लेकर बेरोजगार फार्मासिस्टों में गहरी चिंता और असमंजस का माहौल है।
टनकपुर क्षेत्र के बेरोजगार फार्मासिस्टों ने मुख्यमंत्री को ज्ञापन भेजकर एक भावनात्मक अपील की है—
“ये केवल पद नहीं, बल्कि ग्रामीण जनता की सेहत और युवाओं के भविष्य का सवाल है।”
बेरोजगार फार्मासिस्ट संघ, टनकपुर शाखा द्वारा भेजे गए ज्ञापन में बताया गया कि स्वास्थ्य उपकेंद्रों में पूर्व से सृजित 391 फार्मेसी अधिकारी पदों को स्थगित किया जाना न केवल बेरोजगार युवाओं के साथ अन्याय है, बल्कि ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए भी घातक सिद्ध हो सकता है।
संघ का कहना है कि यह मामला स्वास्थ्य एवं कार्मिक विभाग से स्वीकृति प्राप्त कर चुका है और राज्य कैबिनेट तक भी पहुँच चुका है। अब केवल वित्त विभाग की औपचारिक स्वीकृति और मुख्यमंत्री की पहल से यह मामला अंतिम रूप ले सकता है। ऐसे में इन पदों को क्रियाशील करने की अंतिम जिम्मेदारी माननीय मुख्यमंत्री के हाथों में है।
फार्मासिस्टों ने भावुक होते हुए याद दिलाया कि यही फार्मेसी अधिकारी थे, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद ग्रामीण जनता को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ दीं। कोरोना जैसी वैश्विक महामारी में, जब हर कोई घरों में कैद था, तब यही स्वास्थ्यकर्मी फ्रंटलाइन पर खड़े रहे—दवाइयाँ बाँटीं, लोगों को समझाया और कई जिंदगियाँ बचाईं।
अब उन्हीं पदों को समाप्त करना,
एक ओर जहाँ ग्रामीण जनता को दवा और उपचार से दूर कर देगा,
वहीं दूसरी ओर वर्षों से तैयारी कर रहे बेरोजगार युवाओं की उम्मीदों को भी तोड़ देगा।
संघ के पदाधिकारियों का कहना है कि सरकार एक तरफ बेरोजगारी दूर करने की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ पहले से स्वीकृत पदों को समाप्त करना नीति और संवेदना—दोनों पर सवाल खड़े करता है।
ज्ञापन देने वालों में संघ अध्यक्ष चतुर महराना, मंत्री पुष्कर पाल सिंह रावत, संजय, अभिनव जनार्दन जोशी, प्रमोद कुमार, अंकेश कुमार, राजेन्द्र प्रसाद, अमित कुमार, भीम, चेतन सहित कई बेरोजगार फार्मासिस्ट शामिल रहे।
अब सबकी निगाहें मुख्यमंत्री की ओर टिकी हैं—
क्या ग्रामीण स्वास्थ्य व्यवस्था और बेरोजगार युवाओं की उम्मीदों को नई सांस मिलेगी?
या फिर 391 पदों के साथ 391 परिवारों के सपने भी फाइलों में दबकर रह जाएंगे?


