in , , , , , , , , ,

1172 मतदाता, 986 वोट और फिर भी परिणाम पर इतना बड़ा सवाल—टनकपुर महाविद्यालय में आखिर मतदान प्रक्रिया में कहां हुई चूक?

कौन जीता, कौन हारा से बड़ा सवाल—टनकपुर कॉलेज में हर वोट की विश्वसनीयता पर उठे सवाल, परिणाम घोषित करने से पहले हो रही जांच

टनकपुर के राजकीय महाविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव के बाद अब सिर्फ परिणाम का इंतजार नहीं है, बल्कि पूरी चुनाव प्रक्रिया की पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।

महाविद्यालय में कुल 1172 मतदाता थे, जिनमें 986 छात्र-छात्राओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। अध्यक्ष पद की मतगणना में एनएसयूआई प्रत्याशी ध्यान सिंह बोहरा को 499 वोट, जबकि एबीवीपी प्रत्याशी सुमित सिंह नायक को 484 वोट मिले। यानी अंतर रहा महज 15 मतों का।

मतगणना के बाद जब एनएसयूआई प्रत्याशी को विजयी माना गया तो समर्थकों ने जश्न भी मनाया। लेकिन इसके बाद एबीवीपी की ओर से मतों के अंतर और कथित फर्जी मतदान को लेकर आपत्ति जताई गई और पुनर्गणना की मांग सामने आई।

इसके बाद मामला सिर्फ दो प्रत्याशियों के बीच 15 वोट के अंतर का नहीं रह गया।

बताया गया कि कॉलेज परिसर और प्रवेश द्वार के सीसीटीवी फुटेज खंगाले गए। कुछ संदिग्ध लोगों के प्रवेश को लेकर भी सवाल उठे और इसी के बाद परिणाम की घोषणा रोक दी गई। प्रशासन की ओर से जांच जारी होने की बात कही गई है।

लेकिन अब सबसे बड़ा सवाल यही है—

जब कॉलेज में मतदाता सूची निर्धारित थी, मतदान प्रक्रिया निर्धारित थी और प्रत्येक वोटर की पहचान के आधार पर मतदान होना था, तो आखिर ऐसा संदेह पैदा ही क्यों हुआ?

क्या मतदान के दौरान प्रत्येक मतदाता की पहचान और सूची का पर्याप्त मिलान किया गया?

क्या मतदान केंद्र पर मौजूद जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों के पास मतदाता सूची की पूरी जानकारी थी?

अगर किसी ऐसे व्यक्ति ने मतदान करने की कोशिश की, जो वैध मतदाता नहीं था, तो उसे पहचानने की व्यवस्था कहां और कैसे चूक गई?

और अगर सीसीटीवी फुटेज में वास्तव में कोई संदिग्ध गतिविधि सामने आती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच कौन करेगा और उसका असर कितने मतों पर पड़ा—क्या इसका स्पष्ट जवाब सामने आएगा?

यह भी महत्वपूर्ण है कि किसी भी छात्र संगठन या प्रत्याशी के आरोप को जांच पूरी होने से पहले अंतिम सत्य नहीं माना जा सकता।

लेकिन दूसरी तरफ, अगर चुनाव प्रक्रिया पर गंभीर संदेह पैदा हुआ है, तो उसे नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा।

क्योंकि छात्रसंघ का चुनाव भले ही एक महाविद्यालय का चुनाव हो, लेकिन यह युवाओं के लोकतांत्रिक अधिकार और चुनावी प्रक्रिया को समझने का एक महत्वपूर्ण माध्यम भी है।

इसलिए अब जरूरत किसी संगठन के पक्ष या विपक्ष में खड़े होने की नहीं, बल्कि पूरी प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से सामने रखने की है।

कितने वोट पड़े?

कितने वोट वैध पाए गए?

किस आधार पर मतदाता की पहचान सुनिश्चित की गई?

किसी संदिग्ध मतदान की पुष्टि हुई या नहीं?

सीसीटीवी में क्या सामने आया?

और सबसे महत्वपूर्ण—अंतिम परिणाम किस सत्यापन और किस प्रक्रिया के आधार पर घोषित किया जाएगा?

इन सभी सवालों के स्पष्ट जवाब सामने आने चाहिए।

क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कौन जीता और कौन हारा।

सवाल यह है कि जिस वोट से जीत और हार तय होनी है, वह वोट वास्तव में किसका था और पूरी प्रक्रिया कितनी पारदर्शी थी?

टनकपुर महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं को भी अब किसी अफवाह या आरोप के आधार पर नहीं, बल्कि जांच और प्रमाण के आधार पर सच्चाई जानने का अधिकार है।

फैसला चाहे किसी के पक्ष में आए—लेकिन फैसला ऐसा होना चाहिए, जिस पर विजेता और पराजित दोनों सवाल उठाने के बजाय प्रक्रिया पर भरोसा कर सकें।

Shubham Gaur

Written by Shubham Gaur

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

पीएम श्री राजकीय इंटर कॉलेज मूलाकोट को बदनाम करने का प्रयास या अधूरी जानकारी? सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो का प्रधानाचार्य ने किया खंडन, अभिभावकों और स्थानीय लोगों ने भी वास्तविक स्थिति की पुष्टि की

गांधी जयंती पर कुमाऊँनी महिला क्लब ने पेश की मिसाल, अपने अंशदान से आयोजित किया निःशुल्क स्वास्थ्य शिविर, महिलाओं-बुजुर्गों समेत 109 लाभार्थियों की हुई स्वास्थ्य जाँच