ऊधमसिंह नगर के सितारगंज तहसील में बुधवार को जो कुछ हुआ, उसने पूरे प्रशासनिक तंत्र को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया। एक ओर विजिलेंस विभाग ने रिश्वतखोरी के आरोप में राजस्व विभाग के संग्रह अमीन मदन लाल शर्मा और वरिष्ठ सहायक भूपेंद्र सिंह राणा को ट्रैप कर गिरफ्तार करने का दावा किया, तो दूसरी ओर पूरा राजस्व विभाग अपने कर्मचारियों के बचाव में खुलकर मैदान में उतर आया। देखते ही देखते मामला इतना गर्मा गया कि दो सरकारी विभाग आमने-सामने आ गए और तहसील परिसर रणभूमि में तब्दील हो गया।
विजिलेंस का कहना है कि उन्हें शिकायत मिली थी कि एक व्यक्ति से बंधनमुक्ति कराने और दर्ज एफआईआर समाप्त कराने के नाम पर रिश्वत मांगी जा रही है। शिकायत का सत्यापन करने के बाद बुधवार शाम करीब 3:45 बजे ट्रैप कार्रवाई की गई और दोनों कर्मचारियों को गिरफ्तार कर लिया गया। विजिलेंस इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़ी सफलता बता रही है।
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू बिल्कुल अलग तस्वीर पेश करता है। राजस्व विभाग द्वारा जारी प्रेस नोट में दावा किया गया है कि जिस धनराशि को विजिलेंस रिश्वत बता रही है, वह वास्तव में कई वर्षों से लंबित सरकारी राजस्व एवं केसीसी ऋण की वसूली की राशि थी। विभाग का कहना है कि बकायेदार अवतार सिंह को कई बार नोटिस भेजे गए, फोन पर संपर्क किया गया और तहसील में बुलाया गया, लेकिन वह लगातार कार्रवाई से बचता रहा। प्रेस नोट में यह भी आरोप लगाया गया है कि जब बकायेदार अपने पुत्र के साथ सरकारी बकाया जमा कराने पहुंचा, तभी विजिलेंस ने ट्रैप कार्रवाई कर दी।

राजस्व विभाग का आरोप यहीं नहीं रुका। विभाग का कहना है कि मौके पर विजिलेंस टीम को स्पष्ट रूप से बताया गया कि बरामद रकम सरकारी राजस्व वसूली की है, लेकिन टीम ने उनकी बात को अनसुना कर दिया और गिरफ्तारी की कार्रवाई पूरी कर दी। विभाग ने पूरी कार्रवाई को गलत, निराधार और तथ्यों के विपरीत बताते हुए निष्पक्ष जांच की मांग की है।
जैसे ही दोनों कर्मचारियों की गिरफ्तारी की खबर फैली, तहसील परिसर में माहौल पूरी तरह बदल गया। कर्मचारियों ने विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया, मुख्य गेट पर ताला जड़ दिया और विजिलेंस के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। हालांकि विजिलेंस टीम वैकल्पिक रास्ते से तहसील परिसर में पहुंची और देर रात तक अपनी कार्रवाई जारी रखी। पूरे घटनाक्रम के दौरान भारी पुलिस बल और प्रशासनिक अधिकारी मौके पर तैनात रहे।
तहसीलदार हिमांशु जोशी ने भी कहा कि गिरफ्तार किए गए दोनों कर्मचारी अपने नियमित विभागीय दायित्वों का निर्वहन कर रहे थे और संबंधित धनराशि सरकारी राजस्व एवं केसीसी ऋण वसूली से जुड़ी थी। उन्होंने बताया कि पूरे मामले की रिपोर्ट जिलाधिकारी को भेज दी गई है और आगे की कार्रवाई उनके निर्देशों के अनुसार की जाएगी।
अब इस पूरे घटनाक्रम ने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या वास्तव में रिश्वत का खेल चल रहा था, जैसा विजिलेंस दावा कर रही है? या फिर सरकारी राजस्व वसूली को रिश्वत बताकर कार्रवाई कर दी गई, जैसा राजस्व विभाग आरोप लगा रहा है? आखिर सच किसके साथ है?
फिलहाल इस मामले में दोनों विभाग अपने-अपने दावों पर अड़े हुए हैं। सच्चाई क्या है, इसका फैसला केवल निष्पक्ष जांच और सामने आने वाले साक्ष्य ही करेंगे। लेकिन इतना तय है कि सितारगंज तहसील का यह मामला अब केवल एक ट्रैप कार्रवाई नहीं रहा, बल्कि दो सरकारी विभागों के बीच भरोसे, कार्यप्रणाली और पारदर्शिता पर खड़े हुए बड़े सवाल का रूप ले चुका है। अब पूरे प्रदेश की नजर इस जांच पर टिकी है, क्योंकि जनता जानना चाहती है कि आखिर दोषी कौन है और सच किसके पक्ष में खड़ा है।

