टनकपुर में आज उत्तरांचल स्टेट प्राइमरी टीचर्स एसोसिएशन ने सरकार के टीईटी नियम और नई पेंशन योजना के खिलाफ जोरदार आवाज उठाई। शिक्षकों के संगठन ने पूर्णागिरि तहसील में प्रशासनिक अधिकारी एवं तहसीलदार पिंकी आर्या को ज्ञापन सौंपते हुए इसे उप जिलाधिकारी, जिला शिक्षा अधिकारी, शिक्षा मंत्री, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक भेजने की मांग की। संगठन ने आरटीई लागू होने से पहले नियुक्त शिक्षकों को टीईटी से स्थायी छूट देने तथा वर्ष 2005 के बाद नियुक्त कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना बहाल करने की मांग उठाई।

शिक्षक नेताओं ने कहा कि प्रदेश के हजारों शिक्षक पिछले 30 से 35 वर्षों से लगातार बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। उन्होंने दूरस्थ और ग्रामीण क्षेत्रों में भी पूरी निष्ठा के साथ अपनी सेवाएं दीं और हजारों छात्रों का भविष्य संवारा। ऐसे शिक्षकों से अब दोबारा टीईटी परीक्षा देकर अपनी पात्रता साबित करने की मांग करना उनके अनुभव और सेवा का अपमान है
संगठन ने सरकार के इस प्रावधान को “काला कानून” करार देते हुए कहा कि यह नया नियम शिक्षकों पर जबरन थोपा जा रहा है। उनका कहना है कि वे चयन प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त होकर आए हैं, किसी विशेष सिफारिश से नहीं। यदि दशकों की सेवा के बाद भी उन्हें परीक्षा देकर अपनी योग्यता सिद्ध करनी पड़े, तो इसका सीधा अर्थ यही निकलता है कि सरकार उनकी शिक्षण क्षमता पर सवाल उठा रही है।

शिक्षकों ने यह भी सवाल उठाया कि यदि वे योग्य नहीं थे, तो फिर उनके द्वारा पढ़ाए गए वे छात्र, जो आज प्रशासनिक अधिकारी, इंजीनियर, डॉक्टर, शिक्षक और शासन–प्रशासन के विभिन्न पदों पर कार्यरत हैं, उनकी शिक्षा की मान्यता क्या होगी? क्या उन अधिकारियों को भी दोबारा कोई परीक्षा देकर यह साबित करना होगा कि उन्हें सही शिक्षा मिली थी? संगठन का कहना है कि यह नियम केवल शिक्षकों पर नहीं, बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था पर संदेह पैदा करता है।

पूर्णागिरि तहसील में सौंपे गए इस ज्ञापन के साथ शिक्षकों ने स्पष्ट संदेश दिया है कि वे अपने सम्मान, सेवा अधिकारों और भविष्य की सुरक्षा को लेकर अब खुलकर आवाज उठाएंगे। अब देखना होगा कि उप जिलाधिकारी से लेकर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री तक भेजे गए इस ज्ञापन पर सरकार क्या रुख अपनाती है और क्या दशकों से सेवा दे रहे शिक्षकों को टीईटी से राहत तथा पुरानी पेंशन योजना पर कोई सकारात्मक निर्णय मिलता है।
शिक्षक संगठन ने यह भी कहा कि एक शिक्षक का मूल कार्य बच्चों को शिक्षा देना होता है, लेकिन वर्षों से सरकार और अन्य विभाग समय-समय पर शिक्षकों से कई अतिरिक्त कार्य लेते रहे हैं। चाहे S.I.R. सर्वेक्षण हो, जनसंख्या गणना, मतदाता सूची का पुनरीक्षण, चुनाव ड्यूटी, मतदान प्रक्रिया अथवा अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां— हर बार शिक्षकों ने आगे बढ़कर इन कार्यों को बखूबी अंजाम दिया है। संगठन का कहना है कि शिक्षकों ने कभी भी सरकारी दायित्वों से पीछे हटने की कोशिश नहीं की और प्रत्येक जिम्मेदारी को पूरी निष्ठा के साथ निभाया। इसके बावजूद आज उन्हीं शिक्षकों को टीईटी जैसी परीक्षा के माध्यम से अपनी योग्यता साबित करने के लिए बाध्य किया जा रहा है, जिससे शिक्षकों में गहरा असंतोष और अपमान की भावना पैदा हो रही है।
टनकपुर से उठी यह आवाज अब पूरे उत्तराखंड में चर्चा का विषय बन सकती है। सवाल केवल एक परीक्षा का नहीं, बल्कि उन हजारों शिक्षकों के सम्मान, अनुभव और अस्तित्व का है जिन्होंने अपना पूरा जीवन शिक्षा को समर्पित कर दिया। अब देखना होगा कि सरकार इस ज्ञापन को केवल एक मांग पत्र मानती है या उन शिक्षकों की पीड़ा और लाचारी की पुकार, जो दशकों से नई पीढ़ी का भविष्य गढ़ते आ रहे हैं।


